Tuesday, February 24, 2009

यह कैसी जय है?

जय हो का शोर इस समय सारे भारत में गूंज रहा है।

ए.आर. रहमान के रूप में भारत को एक ऐसी प्रतिभा हासिल है जो अपनी चमक निसंदिग्ध रूप से सारी दुनिया में बिखेर रहा है।
भारत के संगीतकार को, गीतकार को, टैक्नीशियन को ऑस्कर मिला, इस बात की खुशी हम सबको है और होनी भी चाहिए।

मगर यह खुशी स्लमडॉग मिलेनियर के कारण मिली है, यह बात इस खुशी में खटास घोलने वाली है।
स्लमडॉग की सफलता पर खुश न होने का अर्थ पुरातनवादी, प्रतिक्रियावादी, स्यापा करने वाला होना नहीं है।

सवाल यहाँ उस मानसिकता का है जिसे लेकर यह फिल्म बनायी गयी और उस मानसिकता का भी है जिसके चलते इस फिल्म पर पुरस्कारों की पूरी दुनिया में बारिश हुई।

पहले फिल्म बनाने वालों की मानसिकता की बात करें।
यह फिल्म विकास स्वरूप के उपन्यास क्यू एंड ए पर आधारित बतायी जा रही है।
उस उपन्यास की कथा सार संक्षेप में इस प्रकार है – यह कथा राम मोहम्मद थामस नामक लड़के की है जिसे नवजात अवस्था में दिल्ली के सेंट मेरी चर्च के दरवाजे पर छोड़ दिया जाता है। आठ साल तक यह बच्चा पादरी के घर में पलता है और फिर उसे अनाथालय जाना पड़ता है। वहाँ उसकी दोस्ती सलीम नामक लड़के से होती है। एक व्यक्ति पैसे देकर राम और सलीम को मुंबई लेकर आता है और उन्हें भीख मांगने पर मजबूर करता है। अपनी आंखें फोड़ दिये जाने के डर से दोनों वहाँ से भाग जाते हैं। अनेक जगहों पर रहते हैं और अनेक तरह के काम करते हैं। आखिर में 18 साल की उम्र में राम धारावी की झोपड़पट्टी में रहते हुए कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम में हिस्सा लेता है। राम मोहम्मद थॉमस इस कार्यक्रम में एक करोड़ रूपये जीत लेता है। मगर जिस रात इस कार्यक्रम की शूटिंग पूरी होती है, उसी रात पुलिस उसे पकड़ कर ले जाती है और बुरी तरह से उसकी पिटाई करती है। पुलिस की इस हरकत के पीछे टीवी कार्यक्रम का संयोजन करने वाली अमेरिकी कंपनी द्वारा राम पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया जाना होता है। इस आरोप की असली वजह यह होती है कि शो शुरू होने के आठ महीने के भीतर किसी का करोड़पति बनना कंपनी के लिए फायदे का सौदा नहीं होता है। लेकिन झोपड़पट्टी में रहने वाला एक अनपढ़ लड़का कंपनी के न चाहते हुए भी करोड़पति बन जाता है। यह उन्हें सहन नहीं होता है। नुकसान से बचने के लिए अमेरिकी कंपनी पुलिस की सहायता से उस लड़के से धोखाधड़ी की स्वीकारोक्ति चाहती है ताकि वह उसे रुपये देने से बच सके।

पुलिस हिरासत में अधमरी अवस्था में पड़े राम को बचाने के लिए आगे आती है स्मिता शाह नामक एक युवा वकील। वह उस टीवी शो की सीडी राम को दिखाती है और हर प्रश्न का सही उत्तर उसने कैसे दिया, इस बारे में पूछताछ करती है। राम उसे हर प्रश्न का उत्तर देने की वजह बताता जाता है, जो उसके विगत जीवन की घटनाओँ में छुपी है।

इसी में एक कहानी गुड़िया की है। बचपन में राम जिस चाल में रहता था वहीं पास में रहने वाली गुड़िया का शराबी बाप जब उसे अपनी वासना का शिकार बनाना चाहता है तो राम उसे जोर से धकेलता है। इस धक्के में ही उसकी मौत हो जाती है। राम भाग जाता है। गुड़िया उसका यह उपकार नहीं भूलती है। यही गुडिया बड़ी होकर वकील स्मिता शाह बनती है। अंत में राम और गुड़िया अपनी-अपनी राह निकल जाते हैं। उनके बीच कोई प्रेम कथा नहीं जनमती।

अब जिन्होंने स्मलडॉग देखी है, वे इस पूरी कथा से फिल्म की तुलना करें। एक बात जो बेहद तीव्रता से महसूस होती है, वह है इस फिल्म के पटकथा लेखक और निर्देशक की रंगभेदी, वर्णभेदी, देशभेदी मानसिकता। मूल उपन्यास से बिलकुल अलग हटकर जानबूझकर इस फिल्म को ऐसा रूप दिया गया है और उसमें ऐसे दृश्य घुसेड़े गये हैं जो जुगुप्सा उत्पन्न करते हैं और भारत का एक ऐसा कुरूप चेहरा दुनिया के सामने रखते हैं जो वास्तविकता में गंदी मानसिकता का मेल होने के कारण निर्मित हुआ है।
खुले में शौच करना भारत की मानसिकता है मगर पूरी तरह से मल में नहाकर एक सुपरस्टार (अमिताभ बच्चन) के हस्ताक्षर लेने में सफल होने वाला दृश्य किस कलात्मक मांग की पूर्ति करता है, इसका उत्तर स्लमडॉग का गुणगान करने वालों को दूसरों के समक्ष स्पष्ट करने से पहले खुद अपने आप से पूछना चाहिए।

मूल कथा में करोड़पति बनने वाले बच्चे के धर्म का कोई संकेत नहीं है। राम मोहम्मद थॉमस के रूप में वह भारत के तीन प्रमुख धर्मों का प्रतिनिधित्व करता है। मगर फिल्म में उसे जमाल का नाम देकर मुसलिम बनाया गया है। फिर झुग्गी बस्ती में हुए साम्प्रदायिक दंगों को दिखाते हुए उसमें हिंदुओं की क्रूरता को चित्रित किया गया है। मूल कथा से इतना बड़ा विचलन क्या सोद्देश्य नहीं है? दंगे के दौरान बचकर भागता मुसलिम बच्चे को भगवान राम का रूप धारण किया हुआ एक दूसरा बच्चा दिखता है और उसके चलते उसके मन पर राम की छवि अत्यंत गहराई से बस जाती है। इस सारे प्रकरण को फिल्म में डालने की आवश्यकता किस कला की मांग थी?

मूल उपन्यास में खलनायक अमेरिकी कंपनी होती है जो झोपड़पट्टी में रहने वाले एक लड़के की अपने कार्यक्रम में अचानक हुई जीत को सहन नहीं कर पाती है। मगर फिल्म में अमेरिकी कंपनी के किसी हवाले को सफाई से उड़ाते हुए खलनायक बनाया गया है कार्यक्रम के भारतीय एंकर को।

जादू-टोने और सपेरों का देश भारत विगत एक दशक से ज्यादा समय से अपनी बुद्धि का दुनिया भर में डंका बजाता हुआ नित नयी तरक्की कर रहा है, यह बात उन लोगों को कभी हजम नहीं हो सकती जो आज भी साम्राज्यवादी मानसिकता को छोड़ नहीं पाये हैं। जिस इंग्लैंड ने डेढ़ सौ साल से ज्यादा समय भारत पर राज्य किया, आज उसी देश में रहते हुए एक भारतीय दुनिया के सबसे अमीर लोगों में शामिल हो गया। जिस खेल में वे अपना एकाधिकार समझते थे, आज उसी खेल में पछाड़ते हुए भारतीय टीम नंबर एक बनने की और है। पूरा विश्व जब आर्थिक मंदी की चपेट में है, भारत उसका मुकाबला करने में सक्षम नजर आ रहा है। अमेरिका के सबसे सम्पन्न समुदायों में भारतीय समुदाय शामिल है और इतना शक्तिशाली व प्रभावी हो चुका है कि कोई भी शासनाध्यक्ष उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। इस वस्तुस्थिति का स्लमडॉग में हुए भारत के चित्रण से तुलना कीजिए। विसंगति अपने-आप सामने आ जाएगी। दुनिया भर में स्लमडॉग को जिस तरह हाथोंहाथ लिया गया है, यह पश्चिम की उसी हीन भावना और हताशा पर मरहम लगाने की कोशिश का परिचायक है, जो भारत और भारतीयों की चौतरफा सफलता ने पश्चिमी लोगों के भीतर उपजायी है।

मगर अफसोस इस बात का है कि पश्चिमी रंग में रंगे भारतीय भी भारत को उसी चश्मे से देखते हैं। उनके लिए स्लमडॉग की सफलता भारत के लिए गर्व का विषय बन जाती है।
एक आदमी एक बच्चे को तड़ातड़ झापड़ मारता है और फिर लोगों से उसकी तारीफ करता है कि देखो इतने झापड़ मारने पर भी यह बहादुर बच्चा रोया नहीं। अब वह बच्चा बेवजह झापड़ मारे जाने के अपमान को भूलकर इस बात से खुश हो जाए कि उसे झापड़ मारने वाला उसकी सहनशीलता की तारीफ कर रहा है तो इसे क्या कहा जाए? दुर्भाग्य से हमारे टीवी चैनल, हमारे अख़बार और पश्चिमी चश्मे से दुनिया को ही नहीं, खुद भारत को भी देखने वाले भारतीय अपने-आप को वही बच्चा साबित कर रहे हैं। ऐसे में स्लमडॉग के निर्देशक डैनी बोयल भारतीयों की तारीफ न करें तो आखिर क्या करें?

Sunday, November 30, 2008

मुंबई का मंतव्य

मुंबई में हाल ही में हुए आतंकवादी हमले के ढाई दिनों में जो कुछ भी
हुआ, उससे क्या निष्कर्ष निकलता है? शायद देश के अधिकांश लोग
इस बात से सहमत न हो, मगर विडंबना यह है कि सच किसी सहमति
का मोहताज नहीं होता और दुर्भाग्य से कटु सत्य यह है कि इन ढाई
दिनों के दौरान हर स्तर पर हमने अपरिपक्वता का प्रदर्शन किया है।

हर मामले को वोट के नजरिये से देखने वाले हमारे नेता, इस देश का
नेतृत्व करने के लायक नहीं हैं, यह किसी को कहने की आवश्यकता
नहीं है। देश पर अब तक के सबसे बड़े आतंकवादी हमले के दौरान
हमारे गृहमंत्री किस ब्यूटीपार्लर में बैठकर सज-सँवर रहे थे, यह कोई
नहीं जानता। प्रधानमंत्री अपनी उच्चस्तरीय मंत्रणा बैठक में अपने ही
गृहमंत्री को नहीं बुलाकर अपनी नाराजगी प्रकट करते हैं मगर एक
नाकारा व्यक्ति को अपनी टीम में से बाहर निकालने की हिम्मत नहीं
दिखाते हैं।

जिस समय मुंबई के तीन महत्वपूर्ण स्थानों पर
आतंकवादियों का सामना करते हुए हमारे जवान अपनी जान की बाजी
लगा रहे थे, उस समय विपक्ष छाती ठोककर यह कहने की परिपक्वता
नहीं दिखा पाया कि बाद में हम सरकार की हर कमजोरी की बखिया
उधेडेंगे मगर इस समय हमें पूरी दुनिया को यह दिखा देना है कि हम
एक हैं। वोटों की राजनीति करने वाले विपक्ष को मुँहतोड़ जवाब देने में
सत्तापक्ष ने भी देरी नहीं लगायी और उसके छोटे-बड़े नेता यह कहने की
जगह कि इस समय विपक्ष की किसी भी बात पर प्रतिक्रिया देने का
उचित समय नहीं है, अपनी जबान को धार देकर मैदान में कूद पड़े।

भारत का मीडिया संसार का सबसे अपरिपक्व मीडिया है, यह साबित
करने के लिए किसी नये प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। जिनमें न
देश, दुनिया और समाज की समझ है और न मौके की नजाकत का
ज्ञान, ऐसे लोगों की भीड़ वाला हमारा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इस देश की
जगहँसाई का सबसे बड़ा माध्यम बन गया है।

अपने लोकतंत्र और अनपढ़ जनता की राजनैतिक समझ और
परिपक्वता का हम चाहे जितना ढिंढोरा पीटे, मगर जिस जगह
आतंकवादियों के खिलाफ गंभीर और निर्णायक लड़ाई चल रही हो, हमारे
जवानों की जान की बाजी लगी हुई हो, वहाँ महज तमाशबीन बनकर
भीड़ लगाने वाले और अपनी मूर्खता के कारण सुरक्षाबलों के काम में
अनावश्यक बाधाएं पैदा करने वाले लोग क्या प्रदर्शित या हासिल करना
चाहते थे, यह समझना बहुत मुश्किल है।

हमारी गुप्तचर व्यवस्था, विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच तालमेल,
उपलब्ध सूचनाओं के सही उपयोग और विश्लेषण की उनकी समझ और
योग्यता- ये सारी बातें अनेकानेक प्रश्नचिह्नों से घिरी हुई हैं।

और सबसे आखिर में, भरे दिल से, हमारे सुरक्षा बल और उनके आका।
वह चाहे मुंबई पुलिस हो, नौसैनिक कमांडो हों या एनएसजी। इस पूरी
कार्यवाही के दौरान जो सिपाही, अधिकारी या सैनिक शहीद हुए हैं,
उनके बलिदान को कम नहीं आँका जा सकता। मगर इसके साथ ही
यह भी उतना ही बड़ा सच है कि इस पूरे मामले में स्थितियों का
मुकाबला करते हुए विचार और योजना की जगह हड़बड़ी और प्रोफेशनल
अप्रोच के अभाव का ही बोलबाला था।

यह कटु सत्य है। हमारे जवान और युवा अधिकारी वीर हैं, साहसी हैं
मगर उनका नेतृत्व करने वाले उतने योग्य और सक्षम नहीं हैं। कुछ
साल पहले कारगिल युद्ध के दौरान भी यही साबित हुआ था। योजनाबद्ध
ढंग से काम करने की क्षमता के अभाव के कारण ही तब भी हमें बड़ी
तादाद में अपने युवा सैन्य अधिकारियों को खोना पड़ा था।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है मगर इस सच से हम कैसे इंकार करेंगे कि मुंबई
पुलिस के तीन बड़े और महत्वपूर्ण अधिकारी वास्तव में आतंकवादियों
का मुकाबला करने का कोई अवसर पाने से पहले ही अपनी जान से
हाथ धो बैठे। हमारे हजारों सैनिकों पर हाथ की उंगलियों पर गिने जा
सकने वाले आतंकवादी भारी पड़े और ढाई दिन तक अपनी हैवानियत
का नंगा नाच करते रहे।

हमारी गुप्तचर संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर हजारों सवालिया निशान के
बावजूद कोई इस बात की सौ प्रतिशत गारंटी तो नहीं ले सकता कि
तमाम सतर्कता रखकर भी कहीं कोई आतंकवादी घटना नहीं होगी।
आखिर सर्वशक्तिमान अमेरिका भी ९-११ को रोक नहीं पाया था। मगर
यह बात महत्वपूर्ण है कि ऐसी किसी भी घटना का सामना हम किस
कुशलता और परिपक्तवता से करते हैं और उससे सबक लेते हुए भविष्य
में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाते हैं। एक
समाज और एक देश - दोनों ही रूपों में हम भारतीयों ने बार-बार यही
साबित किया है कि अपने पुरातन इतिहास से ही नहीं, हालिया
इतिहास से भी सबक लेना हमें आता नहीं है। वह योग्यता और क्षमता
शायद हमारे खून में ही नहीं है।

Tuesday, November 04, 2008

हिंदुओं की दुर्दशा की कारण-मीमांसा

कानून कहता है कि जब तक किसी पर आरोप साबित नहीं हो जाएं, उसे
निर्दोष मानना चाहिए। इस कसौटी पर साध्वी प्रज्ञा भी फिलहाल दोषी नहीं
कही जा सकती। इस बात से कोई भी व्यक्ति, जिसके अपने पूर्वाग्रह न हों,
इंकार नहीं करेगा। इस पूरे मामले के पीछे आगामी चुनावों में फायदा उठाने
के उद्देश्य से रची गई कोई गहरी साजिश हो, इस संभावना से भी इंकार
नहीं किया जा सकता। आज हमारी राजनीति का स्तर इतना नीचे गिर गया
है कि देश और समाज पर पड़ने वाले गहरे और दूरागामी प्रभाव की चिंता
किए बगैर क्षुद्र स्वार्थों के लिए इस तरह की हरकत अब असंभव नहीं
लगती। यदि हिंदुओं में आतंकवादी प्रवृत्ति घर करने लगी है तो गंभीरता से
इसके कारणों की मीमांसा की जानी चाहिए, यह बात पिछली बार भी कही
गयी थी। मगर इस तर्क के पीछे किसी भी तरह की आतंकी प्रवृत्ति को,
मानसिकता को बढ़ावा देना, हमारी बहुत बड़ी भूल साबित होगी।

हिंदू संस्कृति (जिसमें सनातन धर्म भी शामिल है) को गहराई से
जानने-समझने वाले इसे विश्व की सर्वश्रेष्ठ जीवन-पद्धति मानते हैं और एक
हिंदू होने के नाते हमें इस बात पर गर्व है और होना भी चाहिए। इसका
सबसे बड़ा कारण यह है कि इसमें जीवन के हर पहलू का गहराई से चिंतन
किया गया है। व्यावहारिक जीवन जीने के सर्वश्रेष्ठ उपायों से लेकर सर्वव्यापी
परमात्मा से एकाकार होने तक का कोई भी विषय ऐसा नहीं है, जिसका
आमूल-शीर्ष विचार इस संस्कृति में ना किया गया हो। शायद यही हमारी
सबसे बड़ी दिक्कत है।

व्यावहारिक जीवन और अध्यात्म - ये दो सर्वथा विपरीत विषय हैं। दोनों के
अपने-अपने नियम और सिद्धांत हैं। एक के नियम और सिद्धांत दूसरे पर
लागू नहीं होते। दोनों को एक साथ साधा नहीं जा सकता। अध्यात्म
सामान्य व्यावहारिक जीवन से बहुत आगे का विषय है। व्यावहारिक जीवन
जीते हुए अध्यात्म के मार्ग पर चलने की तैयारी जरूर की जा सकती है।
लेकिन ऐसा करते समय व्यवहार और अध्यात्म के सिद्धांतों के बीच संतुलन
कायम रखना होता है।

संपूर्ण हिंदू जाति का दुर्भाग्य यह है कि उसे व्यवहार और अध्यात्म के बीच
यह संतुलन साधना नहीं आया। इसके विपरीत उसने इन दोनों के मध्य ऐसा
घालमेल किया कि उसकी स्थिति दुविधा में दोनों गये, माया मिली न राम
जैसी हो गयी। और यह इसके बावजूद हुआ कि भगवद्गीता सदियों से हमारे
देश के चिंतकों और विचारकों का सबसे प्रिय ग्रंथ रहा है। लेकिन गीता को,
भगवान श्रीकृष्ण के एकमेवाद्वितीय उपदेशों को जानने-समझने का हमारा
दृष्टिकोण अंधों के दल द्वारा हाथी को देखने के तरीके के समान रहा। जिस
अंधे के हाथ हाथी का जो हिस्सा आया, उसने हाथी का आकार वैसा ही
समझा। उसी तरह भगवद्गीता के उपदेशों की भी हमने अपनी-अपनी रुचि
और समझ के अनुसार एकांगी व्याख्या की।

हिंदू जाति की वर्तमान दुर्दशा का कारण उस साँप की अवस्था से समझा जा
सकता है जिसे एक संत ने किसी भी मनुष्य को न डँसने की शिक्षा दी थी।
जब मनुष्यों ने देखा कि साँप डँसता नहीं है तो उन्होंने उसे पत्थर
मार-मारकर घायल कर दिया। जब वही संत उस घायल साँप से मिले और
सारी स्थिति जानी तो बोले कि वत्स मैंने तुम्हें डँसने से मना किया था,
मगर फुँफकारने से नहीं। यदि इतनी-सी बात तुम ठीक से समझ लेते तो
आज तुम्हारी यह दुर्दशा नहीं होती।

हिंदुओं की कहानी इससे कुछ अलग नहीं है। व्यवहार के साथ अध्यात्म के
अविवेकी-अविचारी घालमेल ने उनकी गति भी उस साँप की तरह ही कर
डाली। यही वजह है कि धर्मांतरण के लिए कभी जोर-जबरदस्ती और
प्रलोभनों का सहारा न लेने वाली हिंदू जाति सदियों से दूसरे धर्मों के इसी
तरह के उपायों का शिकार होती आयी है।

यदि हम यह मानकर चले कि धर्म के नाम पर दंगे करने वाले या आतंक
फैलाने वाले लोग किसी धर्म को नहीं मानते, किसी धर्म का प्रतिनिधित्व
नहीं करते और ऐसे लोग केवल गुंडे, अपराधी और आतंकवादी होते हैं, और
कुछ नहीं, तो एक बात कहने का दुस्साहस मैं करना चाहता हूँ। इसे किसी
विचारधारा के प्रति पक्षधरता न समझा जाए। कुछ वर्ष पहले महाराष्ट्र में
एक गठबंधन विशेष की सरकार के कार्यकाल में धार्मिक आधार पर दंगे न
के बराबर हुए। इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि दंगा करने वालों को
मालुम था कि वोटों के खातिर उनका संरक्षण नहीं किया जाएगा, बल्कि
कठोरता से उनके खिलाफ कार्यवाही की जाएगी।

अनाक्रमण के सिद्धांत का पालन करने का अर्थ यह नहीं है कि हम अपने
ऊपर होने वाले आक्रमण का प्रतिकार भी न करे। यह सिद्धांत सिर्फ देश की
सीमा के मामले में ही लागू नहीं होता, हमारे धर्म, हमारी आस्था और हमारे
विश्वास के मामले में भी लागू होता है। लेकिन यहाँ यह बात भी अच्छी
तरह से ध्यान में रखनी चाहिए कि प्रतिकार करते समय उसका तरीका
समय और स्थितियों के अनुरूप होना चाहिए।

आँख के बदले आँख और जान के बदले जान का कायदा एक समझदार
समाज का आदर्श नहीं हो सकता। हमारी श्रद्धा और आस्था अपने लक्ष्य और
उद्देश्य के प्रति होनी चाहिए। साध्य की जगह साधन विशेष में आसक्ति हमें
अपने लक्ष्य से दूर कर देती है।

जो लोग यह तर्क देते हैं कि हिंदू समाज सदियों से जुल्म सहता आया है
और अब ईंट का जवाब पत्थर से देने का वक्त आ गया है और इसके लिए
आतंकवादी उपायों का अवलंबन करने में भी संकोच नहीं किया जाना
चाहिए, वे अपनी गलत सोच से पूरे समाज को, पूरे देश को पतन की गर्त
में धकलने का प्रयत्न करने के अलावा कुछ नहीं कर रहे हैं।

ऐसे लोगों को यह समझना चाहिए कि इस तरह की कोई भी कार्यवाही
अंततः वे अपने ही देश के खिलाफ कर रहे हैं। उन्हें यह भी दिवास्वप्न
देखना छोड़ देना चाहिए कि हम भारत को हिंदू राष्ट्र में परिवर्तित कर सकते
हैं। आज से नहीं सदियों से हम सहअस्तित्व में विश्वास करते आये हैं। यह
हमारी विशेषता है, कमजोरी नहीं। हम सहज मानवीय रिश्तों के बीच खड़ी
होने वाली दिवारों को गिराने में विश्वास रखते हैं, उन्हें बनाने में नहीं।
लेकिन अपने अस्तित्व के ऊपर होने वाले किसी भी आक्रमण का हम विरोध
करेंगे, यह संदेश पूरे संसार को पहुँचाने के लिए हिंसा ही एकमात्र उपाय नहीं
है।

जो हिंदू धर्म की रक्षा के लिए चिंतित होने का दावा करते हैं, यदि सचमुच
उनकी भावना सच्ची है तो उन्हें पूरी ताकत से पहले हिंदुओं के बीच व्याप्त
कुरूतियों के दूर करने के प्रयत्न करने चाहिए। आज भी हिंदुओं में विभिन्न
जातियों के बीच इतनी गहरी खाइयां है कि उन्हें डुबोने के लिए किसी बाहरी
दुश्मन की आवश्यकता नहीं है।

और फिर एक धर्म विशेष के लोगों को लगातार विकास की मुख्य धारा से
अलग रखकर उनके भीतर असुरक्षा की भावना भरने और उन्हें एक वोट बैंक
में परिवर्तित करके उनका उपयोग करने वाले नेता भी हिंदू समाज का ही
हिस्सा हैं। ये घर के भेदी तो विभीषण भी नहीं कहलाये जा सकते क्योंकि
विभीषण ने आसुरी शक्ति के खिलाफ विद्रोह करके सत्य का साथ दिया था।
मगर ये आधुनिक जयचंद अपने क्षुद्र स्वार्थों के खातिर एक पूरे युग की पीठ
में छुरा घोंप रहे हैं।

हिंदू, मुस्लिम, इसाई या किसी भी धर्म के चश्मे को उतारकर यदि हम सिर्फ
अपने राष्ट्र का विचार करें तो हम सबके लिए यह जरूरी है कि हम पूरी
ताकत और पूरी सख्ती से इस तरह के लोगों, नेताओं और पार्टियों का
विरोध करे जिनका पेट लोगों के बीच नफरत की आग लगाकर ही पलता
और भरता है।

इस देश को किसी हिंदू ओसामा बिन लादेन की नहीं, शिवाजी की
आवश्यकता है। हिंदू हित का दम भरने वाले यदि सचमुच ईमानदार हैं तो
उन्हें एक बार शिवाजी का जीवन चरित्र ध्यान से पढ़ना चाहिए। क्षमा और
साहस के बीच, नैतिकता और वीरता के बीच कैसा संतुलन होना चाहिए, यह
समझना उनके लिए आसान हो जाएगा।

Tuesday, October 28, 2008

आतंकी प्रवृत्ति और हिंदू

वोट बैंक की खातिर धर्मनिरपेक्षता का ढोल पीटने वाले बल्लियों उछल रहे
हैं। धर्म को राजनीति का मोहरा बनाकर सत्ता की रोटियां सेंकने की कोशिश
करने वाले बगले झाँक रहे हैं। अब तक धर्म के आधार पर आतंकवाद के
प्रति सहानुभूति का आरोप झेलने वाले और अपने राष्ट्रप्रेम को भी बार-बार
संदेह की तराजू पर तुलता देखने वाले बाँहें चढ़ाये खड़े हैं कि अब बोलो,
तुममें और हममें क्या अंतर रह गया है? मगर जिन लोगों के लिए हिंदू
होने का मतलब ही प्रेम, करुणा और सहनशीलता को जीवन का आधार बना
लेना रहा है, वे सकते में हैं, पीड़ा से भरे हैं और शर्म से अपना सिर नीचा
किए हुए हैं।
ऐसा नहीं है कि हिंदुओं में अपराधी नहीं हैं, दुष्ट प्रवृत्ति के लोग नहीं हैं,
हत्यारे नहीं हैं और यहाँ तक कि देशद्रोही नहीं हैं। आईएसआई को सेना की
खुफिया जानकारी देने वाले सारे मुसलमान होते हैं, ऐसा नहीं है। उनमें
हिंदुओं के भी नाम शामिल होते हैं। मगर संगठित रूप से किसी एक संप्रदाय
के निरपराध लोगों की बाकायदा प्रशिक्षण लेकर हत्या करने की साजिश में
हिंदुओं के शामिल होने जैसा खुलासा पहली बार हुआ है। और उस पर भी
कहर यह कि ऐसा करने वालों में एक साध्वी का भी नाम उछला है।
संन्यास लेकर अपने परमप्रिय प्रभु से एकाकार होने का प्रयत्न तो हर
संन्यासी करता है। कुछ प्रभु का आदेश मानकर धर्म, देश और समाज की
भलाई और उत्थान के काम में भी जुट जाते हैं। शंकराचार्य ने जहाँ सनातन
धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए पूरा देश अपने कदमों से नाप लिया था वहीं
समर्थ स्वामी रामदास ने अपने समाज में फैली अकर्मण्यता और कायरता
को दूर करने के लिए देशभर में मठों और हनुमान मंदिरों की स्थापना कर
बलोपासना की अलख जगायी थी। स्वामी विवेकानंद ने संन्यास लेकर अपने
धर्म की अलख दुनिया भर में जगायी थी और अपनी प्रतिभा से लोगों के
दिलों पर विजय प्राप्त की थी। लेकिन यह पहली बार हुआ है कि गेरुआ वस्त्र
धारण करने के बाद किसी ने किसी एक खास संप्रदाय के लोगों की हत्या
की साजिश के लिए बम बनाने का प्रशिक्षण लिया हो। कम से कम आरोप
तो वैसा ही है।

कुछ लोग यह मुद्दा उठा रहे हैं कि हजारों साल से सहअस्तित्व की भावना
के साथ रहने वाले हिंदू धर्म के कुछ लोगों को यदि आतंक का रास्ता
अपनाना पड़ा है तो इसके कारणों की मीमांसा गंभीरता से की जानी चाहिए।
लेकिन कोई भी कारण इस तरह के किसी भी कृत्य को समर्थनीय नहीं बना
सकता। आतंक फैलाना और निर्दोष लोगों की हत्या करना ऐसे कृत्य हैं
जिनका किसी भी कारण से और किसी भी स्थिति में समर्थन नहीं किया जा
सकता।

पूरे देश में यह एक आम धारणा है, खासकर बहुसंख्यक समुदाय में कि
आतंकवाद की किसी भी घटना के प्रति, उसमें शामिल लोगों के प्रति
आमतौर पर मुस्लिम समुदाय का नजरिया सीधे-सीधे धर्म से प्रेरित रहता
है। यही वजह है कि इस तरह की घटनाओं की कड़े शब्दों में निंदा करने के
लिए न केवल आम मुस्लिम बल्कि मुस्लिम बुद्धिजीवी वर्ग भी जल्दी से
आगे नहीं आता। आज जब पहली बार यह बात सामने आयी है कि हिंदुओं
में भी देश के भीतर आतंक की साजिश रचने की प्रवृत्ति घर करने लगी है,
सभी भारतीयों को, विशेषकर हिंदुओं को यह गलती नहीं दोहरानी चाहिए
और इस तरह की मानसिकता की कड़ी निंदा करने में देर नहीं लगानी
चाहिए।

इस तरह की किसी भी मानसिकता या प्रवृत्ति के अंकुर यदि फूटे हैं तो उन्हें
तत्काल जड़ से उखाड़ फेंकने और यह संदेश सारे देश को देने में देर नहीं
लगायी जानी चाहिए कि इस देश के नागरिक के रूप में हम किसी भी
परिस्थिति और किसी भी वजह के नाम पर इस तरह की घटनाओं को
स्वीकृति देना तो दूर कतई बर्दाश्त नहीं कर सकते।
राजनीति की रोटियां सेंकने वाले इस बात का अपने-अपने स्वार्थ के हिसाब
से उपयोग करेंगे। कानूनी प्रक्रिया के नाम पर देश की संसद पर हमला
करने की साजिश में शामिल व्यक्ति को फाँसी देने में जानबूझकर देरी करने
या आतंकवादियों के इनकाउंटर के दौरान एक पुलिस अधिकारी के शहीद
होने के बावजूद उस पर प्रश्नचिह्न लगाने वाले लोगों की मानसिकता और
उसके परिणामों पर चर्चा की जानी चाहिए। मगर इससे पहले यह संदेश
आतंकी साजिश रखने वाले हर व्यक्ति तक पहुँचाया जाना चाहिए, चाहे वह
किसी भी धर्म या समुदाय से सम्बन्ध रखता हो, कि देश की एकता,
अखंडता और संप्रभुता के खिलाफ होने वाली किसी भी कोशिश को बर्दाश्त
नहीं किया जाएगा।

वैसे भी किसी हिंदू व्यक्ति का आतंकी मुहिम में शामिल होना इसलिए भी
बहुत गंभीर है कि मुस्लिम और इसाई समुदाय ने तो धर्म के नाम पर कई
लड़ाइयां लड़ी हैं मगर हिंदुओं ने कभी धर्म के नाम पर युद्ध नहीं किया है।
धर्म के प्रसार का हिंदुओं का तरीका हमेशा प्रेम और सद्भाव रहा है, आतंक
नहीं। यही वजह है कि एक प्रखर देशभक्त होने के बावजूद हम सावरकर के
मुकाबले महात्मा गांधी को तरजीह देते रहे हैं, जिनके भारत की तस्वीर
एकरंगी नहीं है। वह हर रंग से मिलकर मुकम्मिल होती है। आतंक की
साजिश रचने वाला कुछ और चाहे कहलाये मगर वह हिंदू कहलाने के लायक
तो कतई नहीं हो सकता।

Tuesday, October 21, 2008

मीडिया मेहरबान तो राज पहलवान

इसे हमारे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की मुर्खता कहा जाए या फिर मजबूरी।जो राज ठाकरे दिन-रात हिन्दी-अंग्रेजी टीवी चैनलों को गालियां देते हैं,
बेइज्जत करते हैं, वे ही चैनल राज की गिरफ्तारी की ख़बर दिन भर
दिखाकर राज ठाकरे को मुफ्त की पब्लिसिटी दे रहे हैं।
यह क्या राज की चालाकी नहीं है? उनकी छोटी-सी पार्टी, जिसकी हैसियत
महाराष्ट्र में आज तक छुट-पुट सीटों को छोड़कर कहीं साबित नहीं हो पायी
है, उसे और खुद को पूरे देश में उन्होंने इन्हीं चैनलों का उपयोग करके
प्रख्यात कर दिया है। चाहे उनका रवैया बदनाम हुए तो क्या नाम तो होगा
वाला रहा हो।
जिस राज्य में राज के आदर्श बाल ठाकरे कभी अपने अकेले के दम पर
अपनी पार्टी शिवसेना को सत्ता में नहीं ला पाए, उस राज्य में अपने चाचा
की नकल करने वाले राज ठाकरे सर्वेसर्वा हो गए हैं, ऐसी इमेज टीवी चैनल
बना रहे हैं। इन टीवी चैनलों को देखकर शायद पूरे देश में लोग यही मानते
या समझते हैं कि राज की मर्जी से महाराष्ट्र का हर पत्ता हिलता है और वे
राज्य में कानून और सरकार से भी बड़े हो गए हैं।
उत्तर भारतीयों के खिलाफ कुछ माह पहले एक आन्दोलन छेड़ा गया। मुंबई
और कुछ अन्य जगहों पर कुछ लोगों के साथ मारपीट की गई। कुछ
तोड़फोड़ की गई। उसी की तस्वीरें बार-बार दिखाकर हिन्दी-अंग्रेजी मीडिया
ने राज को हीरो बना दिया। लेकिन इसके पीछे का सच क्या है? पूरे देश में
छुटपुट बातों को लेकर दंगा होने की घटनाएं आये दिन होती रहती हैं। कई
बार उसमें अनेक लोगों को अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ता है। लेकिन
महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों के खिलाफ छिड़े मनसे के आंदोलन में एक व्यक्ति
की मौत हुई और वह भी मराठी व्यक्ति की। उस आंदोलन के दौरान डरकर
कुछ लोग बिहार या उत्तर प्रदेश में लौट गए हों मगर क्या महाराष्ट्र उत्तर
भारतीय लोगों से खाली हो गया?
वास्तविकता यह है कि स्थिति में आज भी कोई खास फर्क नहीं पड़ा है।
महाराष्ट्र के अधिकांश उद्योग उत्तर भारतीय मजदूरों और कर्मचारियों की
सहायता से ही चल रहे हैं।
उस समय मराठी लोगों के रोजगार के नाम पर हंगामा करने वाले राज या
उनकी पार्टी ने पूरे देश में चर्चा पाने का अपना मकसद पूरा होने के बाद
बड़े सुविधाजनक ढंग से रोजगार का मुद्दा छोड़ दिया और दुकानों के
साइनबोर्ड मराठी में किये जाने का नया मुद्दा छेड़ दिया। उनकी अपेक्षा के
अनुरूप इस बार भी मीडिया ने इसे जमकर उछाला और अपना लाभ देखने
की आदत वाले कुछ दुकानदारों ने तोड़फोड़ के डर से मराठी में अपने
साइनबोर्ड बनवा लिये। मगर क्या अंग्रेजी के साइनबोर्ड महाराष्ट्र से खत्म हो
गए? जिन्हें कोई गलतफहमी हो, उन्हें एक बार महाराष्ट्र का दौरा कर लेना
चाहिए।
मीडिया द्वारा बनायी गयी इस इमेज का परिणाम था कि जेट एयरवेज से
निकाले गये वे कर्मचारी, जिन्हें न राज ठाकरे की नीतियों में आस्था है न
तरीकों में, उनकी शरण में जा पड़े। प्रचार के इस बेहतरीन मौका का राज
ने भरपूर फायदा उठाया। नरेश गोयल भी शरणागत हुए। राज मसीहा हो
गए।
और गरम लोहे पर चोट करने के सिद्धांत के अनुरूप रेलवे में भरती के लिए
होने वाली परीक्षा के दौरान मारपीट का अपना पुराना हथियार अपनाकर
राज नये सिरे से चर्चा में आ गए। मीडिया हर बार की तरह इस बार भी
राज के मुफ्त प्रचार में जुट गया है। हर बार राज के सामने शरणागत
होकर उन्हें बाल ठाकरे के कद का नेता बनाने और इस बहाने उद्धव ठाकरे
को मात देने के प्रयास में लगी राज्य सरकार ने इस बार उन्हें गिरफ्तार तो
कर लिया है मगर उनके खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही हो पाएगी, इसकी
उम्मीद राजनीति के गिरते हुए स्तर को देखते हुए कम ही है।
मीडिया की कृपा और राज्य सरकार के सहयोगात्मक रवैये के चलते पूरे देश
में राज ठाकरे की छवि चाहे महाराष्ट्र के भाग्यविधाता की बन गयी हो मगर
राज्य की आम जनता के बीच उनकी कितनी पैठ है, इसका पता आने वाले
चुनावों में पूरे देश को लग ही जाएगा। तब तक आम लोग परेशानी उठाते
रहेंगे। क्योंकि उन्हें तो इसकी आदत है।

Wednesday, April 05, 2006

मेरे जीवन में धर्म का महत्व



यहाँ सबसे पहले यह स्पष्ट कर लिया जाना जरूरी है कि धर्म से तात्पर्य क्या है? एक धर्म वह, जिसे हम धारण करने के अर्थ में लेते हैं और जिसके आधार पर 'धर्मनिरपेक्षता` असंभव-सी चीज दिखायी देती है, दूसरा अंग्रेजी के शब्द रिलीजन के अर्थ में।
मुझे लगता है कि यहाँ धर्म से तात्पर्य उस आचार-विचार पद्धति से जिसे व्यक्ति अपनी परम्परा, रुचि और विश्वास के आधार पर अपनाता है और जिसे हम हिन्दू, मुस्लिम, इसाई आदि धर्म के नाम से सम्बोधित करते हैं।
यहाँ एक तीसरी धारा भी है, जो कहीं न कहीं प्रारंभ तो इसी धर्म रूपी आचार-विचार-व्यवहार से होती है मगर बाद में अध्यात्म का रूप लेकर बहुत आगे तक जाती है या कहें कि उससे बहुत ऊपर उठ जाती है।
अब प्रश्न उठता है धर्म के महत्व का। यह अंतत: व्यक्ति विशेष की सोच, रुचि, भावनाआें और स्थिति पर निर्भर करता है। यहाँ चूँकि विषय को व्यक्ति केंद्रित रखा गया है इसलिए इस पर व्यापक रूप से चर्चा करना उचित नहीं होगा।
मेरे जीवन में धर्म का महत्व - यह बड़ा उलझा हुआ मामला है। सम्प्रदाय के रूप में धर्म का महत्व मेरे लिए मानवता के बाद आता है मगर मानवता सर्वोच्च है, यह बात मैंने धर्म की राह पर चलते हुए ही जानी-समझी। यह एक ऐसा अंतर्सम्बन्ध है जिसे धर्म की पूर्वाग्रही आलोचना करने वाले अनदेखा कर देते हैं।
धर्म के बारे में विचार करते हुए शायद यह बात सबसे पहले ध्यान में रखी जानी चाहिए कि व्यक्ति के लिए धर्म होता है, धर्म के लिए व्यक्ति नहीं। र्धाामक पुस्तकें एक व्यक्ति, उसकी सोच, उसके व्यवहार और उसके जीवन को वर्जनाआें से, बेड़ियों से मुक्त करने वाली होनी चाहिएं, उसमें जकड़कर पशु बना देने वाली नहीं। यह बात भी ध्यान में रखी जानी चाहिए कि हर व्यक्ति, परिस्थिति और समय का अपना सच होता है। इस संसार की सीमा में कोई भी सत्य अंतिम नहीं है।धर्म एक ऐसे विशाल वृक्ष की तरह होना चाहिए जो अपनी शरण में आने वाले हर व्यक्ति को फल-फूल और छाया प्रदान कर सके। धर्म मीठे जल के एक ऐसे सरोवर के रूप में होना चाहिए जो हर प्यासे की प्यास बुझा सके, उसे तृप्ति का एहसास दे सके। धर्म व्यक्ति को स्वतंत्रता के अनंत आकाश में उड़ने के लिए तैयार करने वाला होना चाहिए, उसके पाँव की बेड़ियां बनकर उसकी किसी भी यात्रा की संभावना को सदा के लिए खत्म कर देने वाला नहीं।
यदि पूजा करने से या कोई र्धाामक पुस्तक पढ़ने से मुझे शांति मिलती है, आत्मिक बल मिलता है, आनंद मिलता है, जीवन की जंग में नये उत्साह के साथ उतरने का साहस मिलता है तो मुझे वह क्यों नहीं करना चाहिए? मगर इसका अर्थ यह भी नहीं कि मैं इसे अपने जीवन की एक ऐसी अनिवार्य दिनचर्या बना लूं जो अंतत: मुझे उबा दे।
मैं जो शांति किसी अच्छे, सकारात्मक उर्जा से परिपूर्ण मंदिर में जाकर प्राप्त करता हूँ, वही शांति मुझे ऐसे ही अणुआें से परिपूर्ण गुरुद्वारे, दरगाह या चर्च में भी मिल जाती है। न वह गुरुद्वारा, दरगाह या चर्च इस मामले में मुझसे कोई पक्षपात करता है (वह तो केवल लोगों की विशेषता है) और न मेरे भीतर इसे लेकर किसी तरह का कोई पूर्वाग्रह होता है।
धर्म का सीधा-सीधा सम्बन्ध व्यक्ति के आचार-विचार और व्यवहार से है। मेरी दृष्टि में महत्व उसी धर्म का है जो हमें इस सृष्टि से, मानव और प्राणी मात्र से प्रेम करना सिखाए, जो हममें धैर्य भर सके और साहस भी। जो न हमें पशु बनाए और न यंत्र, बल्कि एक मानव के रूप में ही हमें प्रतिष्ठित-पल्लवित करे। नाम उसे चाहे जो दिया जाए, रूप उसका चाहे जो हो, मगर यदि धर्म एक व्यक्ति को एक जिम्मेदार सामाजिक प्राणी के रूप में, एक बेहतर मानव के रूप में जीने के लिए प्रेरित, प्रोत्साहित करता है तो वह सार्थक है। इस कसौटी पर यदि वह खरा नहीं उतरता तो वह और चाहे जो कुछ हो, मगर अपने सच्चे अर्थों में धर्म नहीं हो सकता।

Friday, January 06, 2006

`पशु-तत्त्व' का मूल प्रश्न

तो माकपा के पोलित ब्यूरो की पहली महिला सदस्य और माकपा प्रमुख प्रकाश करात की पत्नी वृंदा करात ने चर्चा में आने के लिए सटीक निशाना लगा ही लिया। कुछ लोग चर्चा में आने के लिए, बने रहने के लिए कोई न कोई जुगाड़ खोजने में लगे रहते हैं। ऐसे लोग उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं जो यह मानकर चलते हैं कि बदनाम होंगे तो क्या हुआ, नाम तो होगा।

और हमारा मीडिया। हमेशा की तरह उसने इस बार भी अपने गैर-जिम्मेदाराना रवैये का जी खोल कर प्रदर्शन किया। बेचारे स्वामी रामदेव। वृंदा करात नहीं हुई, सुप्रीम कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश हो गयी और सारे मीडिया ने पहले दिन ही बिना कुछ सोचे-समझे स्वामी रामदेव को दाऊद इब्राहिम और ओसामा बिन लादेन से भी बड़ा अपराधी घोषित कर दिया।

स्वामी रामदेव की दवाओं में पशुओं की हड्डियां और इस जैसे अन्य शीर्षकों का अर्थ क्या है? १५० से ज्यादा दवाएं बनाने वाली दिव्य फार्मेसी की क्या सभी दवाओं में पशुओं की हडि्डयों का चूरा पाया गया है? जिन तीन-चार प्रयोगशालाओं में ये दवाएं भेजी गयीं, उनमें से कितनी प्रयोगशालाओं ने इस प्रकार का निष्कर्ष निकाला? सभी या केवल माकपा शासित कोलकाता की प्रयोगशाला ने? आयुर्वेद में दवा के तौर पर स्वीकृत शंख भस्म को ऐलोपैथी के नजरिये से पशु-अंश माना जाता है, इसलिए यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि जिस पशु-अंश की बात को इतना प्रचारित किया जा रहा है, वह वास्तव में क्या है। नमूने इकट्ठा करने और उसे भेजने के तरीके पर सवालिया निशान तो अपनी जगह हैं ही।

एक बात बहुत स्पष्ट है। बावजूद इसके कि स्वामी रामदेव हिंदू धर्म की परम्पराओं के तहत् दीक्षित एक संन्यासी हैं, उनके कार्यों का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। वे मानव-मात्र की ऐसी सेवा कर रहे हैं, जिसकी मिसाल भारत के वर्तमान ही नहीं, इतिहास में भी मुश्किल से मिलेगी। उनके कार्यों का सम्बन्ध सीधे-सीधे मानव के शरीर से है। यही वजह है कि उनके अनुयायियों में सभी धर्मों, सम्प्रदायों, जातियों और वर्गों के लोग हैं। दूसरे उनका मुख्य कार्य दवाएं बेचना नहीं, योग सिखाना है, जिसका अंतिम लक्ष्य आयुर्वेद सहित सभी प्रकार की दवाओं से मुक्ति का है। यदि दिव्य फार्मेसी, किन्ही एक या दो दवाओं में शामिल तत्वों का उसके लेबल पर उल्लेख न किये जाने की दोषी पायी भी जाती है तो भी उन दवाओं की गुणवत्ता और किसी रोग विशेष में उन दवाओं से होने वाले लाभ पर प्रश्नचिन्ह नहीं लग सकता।

स्वामी रामदेव की नीयत पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता, मगर उनका विरोध करने वालों की नीयत पर कई सवालिया निशान लगे हुए हैं। जब शीत-पेयो में विषैले तत्वों की मौजूदगी का मामला उठा था और भारत की सर्वोच्च नीति नियामक संस्था की एक समिति ने भी इस बात की पुष्टि की थी कि पेप्सी और कोकाकोला जैसे शीत पेयों में मानव शरीर के लिए अत्यधिक हानिकारक तत्व खतरनाक मात्रा में पाये जाते हैं तब ये नेत्री या इनके अन्य संगी-साथी कहाँ थे? ऐसे शीत-पेयों का भारत में निर्माण और वितरण प्रतिबंधित करने के लिए इन लोगों ने क्या किया? यह स्वामी रामदेव ही हैं, जिनकी सीख और अनुरोध के कारण इन शीतपेयों की बिक्री में लक्षणीय गिरावट आयी है। इसके अलावा भारत में १६००० से अधिक ऐसी ऐलोपैथी की दवाएं बेची जाती हैं जो अमेरिका और अन्य यूरोपीय देशों में प्रतिबंधित हैं। इस बारे में अक्सर समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं में खबरें आती रहती हैं। इन दवाओं पर रोक लगाने के लिए इन लोगों ने अब तक कितनी बार आवाज उठायी, आंदोलन किये और मौत का खुला व्यापार करने वालों को गिरफ्तार करने की मांग उठाई? और सबसे बड़ी बात, धर्म को अफीम मानने वाले मार्क्स के अनुयायी आज लोगों की आस्था पर आघात की चिंता करने लगे हैं? क्या यह विरोधाभास आश्चर्यचकित नहीं करता?

एक दिन के भीतर ही स्वामी रामदेव को मिले अभूतपूर्व जन-समर्थन को देखकर राजनीतिक दलों और समाचार-पत्रों के भी सुर बदलने लगे हैं। जहाँ तक मूल मुद्दे का सवाल है। वह चाहे स्वामी रामदेव ही क्यों न हो, कोई भी कानून से ऊपर नहीं है। निष्पक्ष रूप से दिव्य फार्मेसी की दवाओं की जाँच हो, और उसका जो भी निष्कर्ष हो, उसका उचित परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण करने के उपरांत दोषी पाये जाने वालों के खिलाफ समुचित कार्यवाही हो। इससे किसी को भी इंकार नहीं है। मगर केवल सस्ता प्रचार पाने के लिए इस देश के करोड़ों लोगों को रोग और दवाओं से मुक्ति पाने के लिए प्रेरित करने की अलख जगाने वाले, मानव-मात्र के स्वास्थ्य और भले के लिए दिन-रात लगे हुए एक क्रांतिकारी को सरेआम बेइज्जत करने की कोशिश करने वालों का भी भंडाफोड़ होना जरूरी है।